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सक्सेस स्टोरी: 2 करोड़ की कंपनी का मालिक बना, इंफोसिस में लगता है कभी झाड़ू पोछा, 80 रुपया के लिए ट्रैक में भरी थी मिट्टी।

दादासाहेब के नाम जाने वाले 2 करोड़ की कंपनी मालिक जोकि कभी करते थे दूसरे के खेत में काम करते थे उन्होंने खुदा बताई अपनी सक्सेस होने की कहानी की तरह से 80 रुपए के लिए ट्रैक चलते थे और आज है इसने बड़े कंपनी के मालिक, जानिए उनकी   जबानी।

दादासाहेब, महाराष्ट्र के सबसे पिछड़े जिले में से एक बीड़ में रहने वाला हूं इससे जिले में पथरीली जमीन और पहाड़ के बीच में 

बसा गांव में रहकर जहा खेती-बाड़ी के नाम पर कुछ भी नहीं थे वाला अपना पेट पालने के लिए कुएं खोदना, दीवार जोड़ना, मजदूरी करना, गन्ने काटना इस तरह का काम करके अपना जीवन यापन करते थे, दादासाहेब ने बताया कि उन्हें कोई भी काम करने से परहे नही रहा है और उनके हालात ऐसे रहें है कि जो मिलता था वो कर लेते थे क्योंकि एक अच्छी लाइफ चाहते थे।

बचपन से करा खेतो में काम।

जब में छोटा था तो मैं, मम्मी-पापा और मेरी बहन हम सभी लोग गन्ने की कटाई करने के लिए दूसरे शहरों में जाते थे मेरी मां तभी गन्ने की कटाई करती थी जब मेरा छोटा भाई मां के पेट में था और 

गन्ने की गठरीयो को क्विंटल - क्विंटल भर कर ट्रक पर रात-रातभर लोड करती थी क्योंकि मैं मेरी फैमिली ऐसी जगह से है कि 6 महीने गन्ना काटने के लिए दूसरे शहरों में जाकर रहना होता था और पूरा गांव ही उठकर गन्ने की कटाई करने में लग जाता है।

ऑफिस बॉय वाली बात।

दादासाहेब ने बताया कि सबको यह पता था कि मैं इंफोसिस जैसी बड़ी कंपनी में काम कर रहा हूं पर वहा क्या काम कर ये नही पता था सबको क्योंकि मैंने किसी को नही बताया था। इंफोसिस को जब मैंने छोड़ दिया तो ये बात घरवाले को परेशान कर रही थी कि कम-से-कम एक फिक्स सैलरी घर में आ रही थी उनके लिए नौकरी को छोड़ना मेरी नादानी थी इसको करते रहने के लिए उन्होंने मुझको फोर्स भी किया।

पर मैंने मन बना लिया था फिर मैंने किसी की नही सुनी और नौकरी छोडने के बाद मुंबई की एक ग्राफिक्स कंपनी के साथ काम शुरू करदिया इसी दौरान मैंने ग्राफिक्स, टेम्प्लेट के अलग-अलग फॉर्मेट जैसे VFX, मोशन ग्राफिक्स इन चीजों को सीखा करीब 3-4 साल तक ये सब चलता रहा था।

क्रिएटिविटी से कमाई का फंडा।

जब मैं टेम्पलेट डिजाइन करने वाली एक कंपनी में काम कर रहा था तो मैं देखता था कि क्रिएटिव टेम्पलेट सिर्फ विदेशी प्लेटफॉर्म पर ही मिलते हैं 2015 के बाद से इंडियन डिजिटल मार्केट बूम कर रहा था। इसको ही देखकर ये सोचा कि दूसरी कंपनी के लिए जो काम कर रहा हूं, उसे खुद के लिए करना चाहिए।

ट्रेनिंग।

10वीं से पहले स्केच और ड्रॉइंग बनाने में इंटरेस्ट था। जब इंफोसिस में ऑफिस बॉय की जॉब लगी, तब ग्राफिक्स डिजाइनिंग के बारे में पता चला और जॉब के साथ-साथ मैं पार्ट टाइम ग्राफिक्स बनाना सीखने लगा, कई कंपनियों में ग्राफिक्स डिजाइनिंग का काम किया। इससे अपनी कंपनी शुरू करने में आसानी हुई।

फंड।

इन्वेस्ट करने के लिए फंड के नाम पर अपने पास कुछ भी नहीं था पहले दोस्त के लैपटॉप से डिजाइन करना, ग्राफिक्स बनाना शुरू किया। दूसरों के लैपटॉप पर कब तक काम करता रहता ये सोचकर पैसे उधार लेकर एपल का एक लैपटॉप खरीदा यही लैपटॉप मेरी पहली पूंजी थी।

मार्केटिंग।

SEO (सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन) पर सबसे ज्यादा काम करता हूं। सोशल मीडिया पर अपनी कंपनी "डिजाइन टेम्पलेट' को प्रमोट करता हूँ। विदेशी कस्टमर के मुताबिक टेम्पलेट की डिजाइनिंग करता हूं। ट्रेंडिंग बिजनेस और फेस्टिवल के हिसाब से भी डिजाइन को कस्टमाइज करता हूं।

बिजनेस मॉडल।

शादी, फंक्शन, बिजनेस, त्योहार... इन सबके मुताबिक हम ग्राफिक्स, टेम्पलेट बनाते हैं। देशी-विदेशी कंपनियां भी कस्टमाइज तरीके से डिजाइन बनवाती हैं। क्लाइंट हमारे प्लेटफॉर्म से अपनी जरूरत के मुताबिक ग्राफिक्स खरीदते हैं और कंपनी का टर्नओवर 2 करोड़ बना हुआ है।

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