Image description

बायोलॉजिकल ट्रीटमेंट: बायोलॉजिकल ट्रीटमेंट की मदद ले कर किया  70 साल के रिटायर्ड फौजी के सड़े हुए अंगूठे का इलाज, हाईपरथेरेपी ऑक्सीजन बचाई जान।

एक 70 वर्षीय रिटायर्ड फौजी जिसका पैर का पंजा पूरी तरह से सड़ गया था इंदौर में रहने वाले के सहज हॉस्पिटल में डॉक्टरों ने उसका बायोलॉजिकल ट्रीटमेंट से इलाज किया और उसको कटने से बचा लिया। इस फौजी को क्रोनिक डायबिटीज थी और किडनी भी खराब होने के कारण सात माह से डायलिसिस का पेशेंट्स रहा जोकि उनका इलाज बॉयोलॉजिकल ट्रीटमेंट में दो प्रकार से किया गया।

इस तरह से हुआ ट्रीटमेंट।

1.सबसे पहले स्टेप में HBOT हाईपरबैरिक ऑक्सीजन थैरपी से ट्रीटमेंट किया गया प्लूप्प लोक ट्रीटमेंट सेंट्रल इंडिया में सिर्फ सहज हॉस्पिटल में किया जाता है।

2.दूसरी स्टेप में ADSVF एडिपोज डराइव्ड स्ट्रोमल वसकुलर फैक्शन से ट्रीटमेंट किया गया और ये ट्रीटमेंट के राइट्स पूरे भारत में केवल सहज हॉस्पिटल के पास मौजूद है।

क्या है मामला।

कमलजीतसिंह जोकि रिटायर्ड फौजी थे अहलूवालिया सिंगापुर टाउनशिप का निवासी रहें है जोकि बीएसएफ में पदस्थ थे उनके बेटे जसपालसिंह ने बताया कि उन्हें लगभग 15 साल से बिटजी की समस्या थी जोकि दो सालों में काफी बढ़ हुई थी और तभी से  पिछले साल उन्हें किडनी की समस्या हो गई फिर डॉक्टरों ने इस बात की जानकारी दी कि उनकी दोनों किडनी काम नहीं कर रही है। इस दौरान उनका किडनी का इलाज हो रहा था तभी उनके पैर का अंगूठा पलंग से टकरा गया जिससे जख्म हो गया और यही घाव हो गया था इस कारण कि उनका इलाज हुआ प्राइवेट अस्पताल में उनके अंगूठा सहित एक उंगली काटनी पड़ी।

ऐसे परेशानी का होना।

1 ऐसा इसलिए होता है कि शुगर के कारण इसके मरीजों की नसें जल्द सिकुड़ने लगती हैं जिससे खून का प्रवाह ठीक से नहीं होता।

2 दूसरा कारण इसका वृद्धावस्था भी है जिसमें एक समय बाद शरीर के अन्य अंगों में खून का प्रवाह होता है लेकिन पैरों में यह 

ठीक से नहीं होता इससे भी चलने-फिरने की शक्ति कम होती है। इस मामले में डॉक्टरों ने बताया कि शुगर होने के कारण ही उनका दो तरह के बॉयोलॉजिकल ट्रीटमेंट किया गया था एक यह कि हाईपरबैरिक ऑक्सीजन थैरेपी (HBOT) और दूसरा एडिपोज डराइव्ड स्ट्रोमल वसकुलर फैक्शन (ADSVF) से किया गया।

टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल।

जब अल्सर पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाता है या कई बार ऐसा होता है कि डायबिटीज पेशेंट की उंगलियां या पैर काटने की नौबत आ जाती है,इस तरह की थैरपी करके मरीजों को इस स्थिति से बचाया जा सकता है।

इस ट्रीटमेंट के लिए पेशेंट को एक स्ट्रेचर पर लिटा दिया जाता है और इसका इलाज कांच के बंद केबिन की तरह एक यूनिट में किया जाता है, इस स्ट्रेचर को खिसकाकर यूनिट में सेट कर दिया जाता है पेशेंट सभी ओर से पैक रहता है इसके अंदर अलग-अलग अनुपात में ऑक्सीजन दी जाती है इससे ऑक्सीजन प्लाज्मा में डिजॉल्व हो जाती है इसके साथ प्लाज्मा हर सेल में ऑक्सीजन बढ़ा देने का काम करता है जिससे नई वेसल्स बनती है ऐसे में जिस सेल में ऑक्सीजन न जाने से अंग को नुकसान हो रहा था उसमें ऑक्सीजन जाने से फिर खून प्रवाहित होने लगता है।

अल्सर के पेशेंट को जहां जख्म होता है एक टेक्नोलॉजी ऑपरेशन थियेटर में इंजेक्शन लगाया जाता है, वहां के सेल्स भी रिजनरेट होने लगते हैं इसी तरह से गहरा जख्म नए सेल बनने से ठीक होने लगते है फिर नए सेल्स के साथ स्किन तेजी से ग्रोथ करती है और जख्मी पूरी तरह से ठीक हो जाता है।

स्पेशलिटी, इसकी खास बात ये है कि मरीज के ठीक ऊपर जैसे की कांच के बाहर उसके मनोरंजन के लिए टीवी होता है यह थैरेपी एक घंटे की होती है।

Views